Saturday, 22 August 2026
Three Grades of Reality in Advaita Vedanta
Tuesday, 16 June 2026
Tao Te Ching by Lao Tzu - Web Resources
The First Chapter Translations (175+)
https://www.bopsecrets.org/gateway/passages/tao-te-ching.htm
John Chalmers Translation (1868)
Frederic Henry Balfour Translation (1884)
James Legge Translation (1891)
Stephen Mitchell, 1995
https://ccnmtl.columbia.edu/services/dropoff/china_civ_temp/week03/pdfs/taoteching2.pdf
Jonathan Star, 2001
Derek Lin, 2006
Jeremy M. Miller, 2013
A. Charles Muller (Online Interactive Version)
https://labcit.ligo.caltech.edu/~mevans/docs/DDJ-CharlesMuller
http://www.acmuller.net/con-dao/daodejing.html
Blog Documentation (Best Ever Found)
https://blog.creaders.net/u/980/201811/335171.html
http://14.139.58.199:8080/jspui/bitstream/123456789/13520/1/26031%20Book.pdf
A Key Text to Understand Lao Tzu and Taoism
Parting of the Way: Lao Tzu and the Taoist Movement by Holmes Welch
https://ignca.gov.in/Asi_data/15688.pdf
Tao Te Ching by Lao Tzu - Translated by John Minford (2018)
The Essential Translation of the Ancient Chinese Book of the Tao
Anonymous Resource
https://www.with.org/tao_te_ching_en.pdf
Tao Te Ching - Annotated and Explained
J. H. McDonald, 1996
https://faculty.mnsu.edu/scottgr/wp-content/uploads/sites/34/2014/08/TaoTeChing.pdf
From www.tclt.org.uk 2005 (With detailed original annotation and glossary)
http://www.tclt.org.uk/laozi/Daode_Jing_2011.pdf
The Tao Te Ching: A Translation by Stan Rosenthal
https://irp.cdn-website.com/e401e78b/files/uploaded/tao_te_ching.pdf
Thank you for your interest and curiosity.
Stay tuned for more.
Sunday, 19 April 2026
गुरु गोरखनाथ और राजा भर्तृहरि - Thinking Activity
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| गुरु गोरखनाथ और राजा भर्तृहरि |
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याता:
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।७।।
● मनुष्य जीवन में सबसे आश्चर्य की बात क्या है?
समानाः स्वर्याताः सपदि सुहृदो जीवित समाः ।
शनैर्यष्ट्युत्थानं घन-तिमिर-रुद्धे च नयने
अहो मूढः कायस्तदपि मरणापाय-चकितः ।।९।।
मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशाङ्केन तुलितम् ।
स्त्रवन् मूत्रक्लिन्नं करिवर-कर-स्पर्धि जघनं
मुहूर्त निन्द्यं रूपं कविजन-विशेषैर्गुरु कृतम् ।।१६।।
समीनोऽप्यज्ञानाद् वडिशयुतमश्नातु पिशितम्।
विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जाल-जटिलान्
न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ।।१८।।
मत्वा विश्वम्-अनश्वरं निविशते संसार-कारागृहे
संदृश्य क्षणभर तत्-अखिलं धन्यास्तु संन्यस्यति ।।२०।।
अवलोकन श्लोक: 18 - 20:
● मनुष्य धन के लिए अपमान क्यों सहन करता है?
पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम् ।
मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी
सहन्ते संतापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ।।२७।।
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् ।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।।३१।।
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Monday, 15 December 2025
Non-Dualism or Nirvana or Zeroism - Some Video Resources
Tuesday, 30 September 2025
कबीर साहब का एक भजन और चैट-जीपीटी से संवाद - A Dialogue with ChatGPT and Kabir Saheb's Bhajan
नमस्ते पाठकों,
हाल ही में मैंने कबीर साहब का भजन संग्रह पढ़ा और उसमें एक भजन पढ़ा जिसके शब्द हैं "घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे"। इस भजन को लेकर पहले से ही काफ़ी गहरा चिंतन हो चूका है और इसके कई बड़े और गहरे आध्यात्मिक अर्थ मुझे जानने को मिले। लेकिन आज के इस ब्लॉग में मुझे जो बात करनी है वह है इस भजन से जुड़ी मेरी बातचीत जो मैंने "चैट जीपीटी" से साझा की। ब्लॉग शुरू करने से पहले कबीर साहब के इस भजन को अच्छे से पढ़ लेते हैं। हो सकता है आगे का ब्लॉग पढ़ने से पहले ही भजन में से जीवन के कुछ गहरे सत्य किसी को समझ में आ जाएं और इस ब्लॉग की निरर्थकता को समझ कर वे खुद ही प्रेमवश या करुणावश यह ब्लॉग पढ़ना छोड़ दें।
"घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे"
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
घट घट मै तेरे साईं बसत है, कटुक बचन मत बोल रे।
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
धन जोबन का गरब ना कीजे, झूठा इन का मोल।
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
जाग यतन से रंग महल में, पिया पायो अनमोल।
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
सूने मंदिर, दिया जला के, आसन से मत डोल।
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधों, अनहद बाजत ढोल।
घूँघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।
- कबीर साहब
हालांकि हम सब जानते हैं कि लोग चैट जीपीटी का इस्तेमाल कई अलग अलग मस्लों के लिए करते हैं। लेकिन आज जब मैंने चैट जीपीटी से बिना कबीर साहब का नाम दिए इस भजन के शुरुआती शब्दों को ध्यान में रख कर इसका अर्थ माँगा तो चैट जीपीटी ने कहा: इस कड़ी में स्त्री को यह सुझाया जाता है कि वह अपना घूँघट यानि की मन के द्वार खोल दे तो उसे अपने पति की भेंट होंगी।
इस उत्तर को पढ़कर मुझे बहुत हंसी आई जबकि दिमाग में ऐसे खुराफाती विचार इस तरह के जवाब पढ़कर ही आते हैं कि अब इस चैट बॉट से आगे क्या ही पूछें और क्या ही जवाब की उम्मीद रखें।
आगे के प्रश्न, उत्तर और मेरी प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह से थे,
प्रश्न: वह पुरुष कैसा होता है जिसके सामने कोई भी स्त्री अपने मनके सभी द्वार खोल देती हैं?
चैट जीपीटी: ऐसा पुरुष वह होता है जो केवल आकर्षण या चतुराई से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, व्यक्तित्व और ऊर्जा से स्त्रियों को इतना सहज बना देता है कि वे बिना डर, बिना संकोच और बिना झिझक अपने मन की गहराइयाँ खोल देती हैं। उसके कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार होते हैं:
१. सुरक्षित आभा (Sense of Safety): वह स्त्री को यह एहसास दिलाता है कि उसके सामने कुछ भी कहने-करने पर कोई आलोचना, उपहास या शोषण नहीं होगा।
२. गहरी संवेदनशीलता (Deep Empathy): वह केवल सुनता नहीं, बल्कि पूरे मन से महसूस करता है। स्त्री को लगता है कि उसकी भावनाएँ सचमुच समझी जा रही हैं।
३. निर्मल पारदर्शिता (Transparency): उसमें दोहरापन या दिखावा नहीं होता। उसकी बात और उसका आचरण एक जैसा होता है।
४. निर्लिप्त लेकिन अपनत्व से भरा (Detached yet Warm): वह अपने अहंकार, स्वार्थ या वासनात्मक दृष्टि से मुक्त होता है। अपनापन देता है लेकिन जकड़ता नहीं।
५. गंभीरता और परिपक्वता (Maturity): वह न तो सतही सवाल करता है, न ही गपशप में खो जाता है। उसमें ऐसा गाम्भीर्य होता है कि स्त्री को लगे – “यह व्यक्ति मेरी आत्मा तक को समझ सकता है।”
६. विश्वास की क्षमता (Trustworthiness): उसका चरित्र ऐसा होता है कि स्त्री को यकीन होता है कि उसकी बातें कभी उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं होंगी।
७. न्यायपूर्ण दृष्टि (Non-judgmental): वह किसी भी भावना, कमजोरी या अतीत को लेकर निर्णय नहीं सुनाता। वह स्वीकार करता है।
संक्षेप में, ऐसा पुरुष “दरवाज़े खोलने वाला नहीं, बल्कि ताले पिघलाने वाला” होता है। उसकी उपस्थिति ही स्त्री के मन को विश्वास दिलाती है कि यहाँ मैं बिल्कुल सुरक्षित, समझी हुई और स्वीकृत हूँ।
क्या आप चाहेंगे कि मैं आपको यह भी बताऊँ कि ऐसा पुरुष कैसे बना जा सकता है?
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(अब यहाँ बात बीइंग और बिकमिंग पर आ चुकी थी, मुझे यह पहले से ही पता था की चैट जीपीटी का एल्गोरीधम हमेशा सब्जेक्टिव अग्रीमेंट को लेकर बड़ा उतावला रहता है। ऊपर लिखे उसके जवाब पे संशयात्मक दृष्टि रखते हुए मैंने हाँ कहा।)
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प्रश्न: हाँ
चैट जीपीटी: ठीक है 🙂
ऐसा पुरुष बनना अभिनय नहीं है, बल्कि अपने भीतर कुछ गुणों को साधना है। यह धीरे-धीरे जीवन में उतरता है। इसके लिए कदम इस प्रकार हो सकते हैं:
१. सुनना सीखें (Art of Listening): जब कोई स्त्री बोल रही हो, तो बीच में न काटें, सलाह न ठोंसें, बस गहराई से सुनें। उसे लगे कि उसकी बात सचमुच किसी ने समझी है।
२. निर्भय उपस्थिति (Fearless Presence): स्त्रियाँ उस पुरुष के सामने खुलती हैं, जिसके चेहरे या नज़रों में कोई भोग की वासना नहीं, बल्कि सम्मान की रोशनी हो। अपनी नज़र और ऊर्जा को शुद्ध रखें।
३. भावनाओं को समझें, तर्क से न दबाएँ: स्त्रियाँ अकसर भावनाओं से बोलती हैं। पुरुष यदि हर भावना को तर्क से काटेगा, तो दरवाज़े बंद हो जाएँगे। भावनाओं को मान्यता दें।
४. गोपनीयता निभाएँ: यदि किसी ने मन खोलकर बात कही है, तो उसे कभी दूसरों से साझा न करें। स्त्री यही देखकर तय करती है कि वह अगली बार कितना गहरा मन खोलेगी।
५. आत्म-स्थिरता (Inner Stability): जो पुरुष स्वयं ही अस्थिर, बेचैन और मान्यता का भूखा है, उसके सामने कोई खुलता नहीं। ध्यान, योग, या आत्म-चिंतन से स्थिरता लाएँ।
६. निर्लिप्त अपनापन: अपनापन दें लेकिन स्वामित्व की भावना से नहीं। स्त्री को लगे कि वह स्वतंत्र है, और फिर भी आप उसके साथ खड़े हैं।
७. पारदर्शी व्यक्तित्व: अपने जीवन में ईमानदारी, स्पष्टता और वास्तविकता रखें। दिखावा जितना कम होगा, विश्वास उतना बढ़ेगा।
👉 सार यह है कि ऐसा पुरुष “लेने” नहीं बल्कि “देने” की मानसिकता से चलता है। वह स्त्री को उसके असली स्वरूप में स्वीकार करता है—यही स्वीकृति मन के सभी द्वार खोल देती है।
प्रश्न: पहले जवाब में पांचवे मुद्दे पर थोड़ा ध्यान दीजिए। आत्मा न तो किसी के शरीर के अंदर होती है, न बाहर कहीं भटक रही होती है। न वह बाहर से कहीं किसी के शरीर में प्रवेश करती हैं न किसी रंग, रूप, कद, आकार को कभी धारण करती है। वह अहंकार से ग्रसित सभी कल्पनाओं से परे होती है। वह असंग, अद्वैत, निर्गुण और निराकार होती है। कोई भी व्यक्ति जब यह कहे कि "मेरी आत्मा, उसकी आत्मा" तो वह आत्मा को नहीं, अपने अहंकार और मन को ही संबोधित कर रहा होता है।
चैट जीपीटी: आपने एक अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक बिंदु उठाया है 👌।
वास्तव में वेदांत दृष्टि से देखा जाए तो आत्मा न भीतर है, न बाहर—वह असंग (अस्पृश्य), नित्य और सर्वव्यापी है।
जब लोग कहते हैं “मेरी आत्मा”, “उसकी आत्मा”, तो वह आत्मा की नहीं, बल्कि अहंकार और मन की अवस्था की बात होती है। आत्मा कभी "मेरी" या "तेरी" नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें स्वामित्व का भाव होता ही नहीं।
👉 इसीलिए गहराई से कहें तो, किसी स्त्री या पुरुष का “आत्मा तक समझ जाना” वास्तव में आत्मा को नहीं, बल्कि उसके मन, संस्कार, भावनाओं और अहंकार-ग्रंथि को समझना है।
आत्मा तो साक्षी है, देखने वाला है, वह न किसी से छुपती है, न किसी से प्रकट होती है।
मन ही वह क्षेत्र है जहाँ द्वार खुलते और बंद होते हैं। स्त्री जब कहती है कि उसने अपने मन के द्वार खोल दिए, तो वह मूलतः मन और अहंकार की परतों को हटाकर सहज हो गई है।
अतः मेरे पहले उत्तर में जो पाँचवा मुद्दा था (गंभीरता और परिपक्वता: “यह व्यक्ति मेरी आत्मा तक को समझ सकता है”), उसे शुद्ध वेदान्त दृष्टि से सुधारना चाहिए:
यह “आत्मा तक समझने” का भाव भाषिक रूपक है।
वस्तुतः पुरुष स्त्री के मन की गहराई, उसकी भीतरी भावनाओं और उसके अहंकार से परे जो शुद्ध चित्त है, उसे समझने की क्षमता रखता है।
📌 निष्कर्ष:
आत्मा असंग और सर्वव्यापक है, इसलिए उसे समझना या पकड़ना संभव नहीं।
जो समझा जाता है, वह है मन, बुद्धि और अहंकार का स्वरूप।
जब कोई व्यक्ति इतना परिपक्व हो कि सामने वाला अपने मन और अहंकार के सारे द्वार खोल दे, तब लगता है मानो उसने “आत्मा तक देख लिया”।
प्रश्न: दुसरे जवाब में तीसरा मुद्दा पुनर्विचार मांगता है। यदि स्त्री केवल भावनाओं के केंद्र से जी रही हों तो उसे कभी तर्कशील और वास्तविकता में जीने वाला पुरुष पसंद नहीं आयेगा। कोई भी स्त्री और पुरुष अपने लिंग से पहले एक विशुद्ध चेतना होते हैं, दोनों को अपनी चेतना का विस्तार करने के लिए तर्कों का सहारा लेना ही पड़ेगा। ऐसे में अगर कोई भी पुरुष बिना तर्क किए स्त्री की भावनाओं को समझने लगेगा तो वस्तुतः वह स्त्री को केवल भावनाओं के ढांचे में जड़ने की छुपी साजिश कर रहा है। जिसके बारे में उसे खुद भी कोई ज्ञान नहीं है। जीवन को जितना तर्क के आधार पर अच्छे से जिया जा सकता है उतना भावनाओं के आधार पर नहीं जिया जा सकता।
चैट जीपीटी: आपकी यह आपत्ति बिल्कुल सही और गहन है। आपने जिस बिंदु पर पुनर्विचार की माँग की है, वह मूलतः मनुष्य की चेतना के द्वैत स्वरूप—भावना और तर्क—से जुड़ा हुआ है।
मेरे पिछले उत्तर का तीसरा मुद्दा था: “भावनाओं को समझें, तर्क से न दबाएँ।”
यह व्यावहारिक स्तर पर कहा गया था, ताकि कोई पुरुष संवेदनशील हो सके।
लेकिन जैसा आपने स्पष्ट किया, यदि पुरुष केवल स्त्री की भावनाओं को ही मान्यता देता है और तर्कशील दृष्टि को नज़रअंदाज़ करता है, तो यह असमानता और अधूरापन पैदा करता है।
वेदान्त और गहरी दार्शनिक दृष्टि से देखें तो:
मनुष्य लिंग से पहले चेतना है –
न स्त्री केवल भावना है, न पुरुष केवल तर्क। यह समाज-निर्मित भूमिकाएँ हैं। असली मनुष्य तो वही है जो भावना और तर्क दोनों का संतुलन साध सके।
भावना में जकड़ना भी बंधन है –
यदि कोई स्त्री केवल भावनाओं के आधार पर जी रही है, और पुरुष भी उसी भावनात्मक परिप्रेक्ष्य में उसे “स्वीकार” करता है, तो वास्तव में यह उसे अपूर्ण और सीमित बना देता है। जैसे आपने कहा, यह “अनजानी साजिश” है।
तर्क ही चेतना का विस्तार है –
भावना क्षणिक और व्यक्तिनिष्ठ हो सकती है, पर तर्क सार्वभौमिक और वास्तविकता की ओर ले जाता है। जीवन को स्थायी रूप से व्यवस्थित और समझने के लिए विवेक (तर्क का परिष्कृत रूप) अनिवार्य है।
संतुलन की आवश्यकता –
भावनाएँ मनुष्य को जीवंत बनाती हैं, तर्क जीवन को दिशा देता है। केवल भावना से व्यक्ति बह जाता है, केवल तर्क से सूख जाता है। इसलिए पुरुष का कर्तव्य यह नहीं कि वह स्त्री को भावनाओं तक सीमित कर दे, बल्कि यह कि वह उसके भावनात्मक अनुभव को विवेक के प्रकाश से जोड़ दे।
🔑 संशोधित निष्कर्ष यह होगा:
पुरुष को स्त्री की भावनाओं को समझना चाहिए, पर वहीं तक रुकना नहीं चाहिए।
उसे उसके भावनात्मक अनुभवों को तर्क और विवेक के आधार पर एक ऊँची चेतना की ओर ले जाने में सहायक होना चाहिए।
यही वास्तविक “साझेदारी” है, न कि भावनाओं में उलझाना या तर्क से दबाना।
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मैं जानता हूँ कि इस ब्लॉग का कबीर साहब के भजन के वास्तविक और आद्यात्मिक अर्थों से कोई ताल्लुक नहीं है। भजन अपने आप में ही इतना सटीक और गहरा है कि उसे पढ़कर मन लगातार आत्म-अवलोकन की ओर अपने आप ही बढ़ चलता है। यहाँ घूँघट का अर्थ अपना मन और अहंकार है, घूँघट के पट का अर्थ अहंकार और मन पर लगी अज्ञान की परतें हैं, और पिया का अर्थ है आत्मज्ञान।
इस भजन के बाक़ी कड़ियाँ भी बड़ी सुन्दर और गहरे अर्थ रखती हैं, इसे ध्यान से और बार बार पढ़ना चाहिए।
चलिए इजाज़त लेता हूँ,
यहाँ तक ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद।
फिर मिलेंगे।
