Sunday, 19 April 2026

गुरु गोरखनाथ और राजा भर्तृहरि - Thinking Activity

नमस्ते पाठकों,

आज हम एक प्रसिद्ध कथा पढ़ेंगे और साथ में वैराग्यशतक से कुछ श्लोक और अर्थ पढ़ेंगे। पढ़ने के बाद आपको अपने अवलोकन यानि की रिफलेक्शन लिखने हैं और उन्हे श्लोक व अर्थ के साथ अपने किसी भी सोशल मीडिया पर शेर करने हैं। चलिए शुरू करते हैं।

गुरु गोरखनाथ और राजा भर्तृहरि


एक बार श्री गुरु गोरखनाथ जी अपने शिष्यों सहित उज्जैन पहुँचे और राजा भर्तृहरि के दरबार में गए। राजा ने बड़े आदर से उनका स्वागत किया। गुरुजी ने देखा कि यह युवक तेजस्वी और प्रतिभाशाली है, लेकिन स्त्रियों के मोह और राजकाज की व्यस्तताओं में उलझा हुआ है।

जाते समय गोरखनाथ जी ने राजा को एक फल भेंट किया और कहा—“इसे बहुत संभालकर रखिए, यह दुर्लभ है।”
राजा अपनी पत्नी पर अत्यंत आसक्त था। उन्होंने सोचा, “यदि यह फल मैं रानी को दूँ तो उसका सौंदर्य और यौवन लंबे समय तक बना रहेगा।” यह सोचकर उन्होंने फल रानी को दे दिया।

लेकिन रानी का लगाव दरबार के एक सेवक से था। उसने सोचा—“यह मेरे प्रिय के काम आएगा।” और फल सेवक को दे दिया।

सेवक ने मन में कहा—“रानी के साथ तो मुझे स्वार्थवश दिखावा करना पड़ता है, मेरा असली लगाव तो अपनी मित्र नर्तकी से है।” और उसने फल नर्तकी को दे दिया।

नर्तकी ने फल अपने पास रख लिया, लेकिन सोचा—“यौवन या रूप भला कितने दिन टिकते हैं? आखिरकार यह सब क्षणभंगुर है। यदि यह किसी को मिलना चाहिए तो वह राजा हैं, जो प्रजा के हित में दिन-रात लगे रहते हैं।” और उसने वह फल राजा को लौटा दिया।

फल देखते ही राजा भर्तृहरि स्तब्ध रह गए। पूछताछ करने पर सारा सत्य खुल गया। उसी क्षण उन्हें भोग, आसक्ति और प्रेमजाल की वास्तविकता समझ में आ गई। उन्होंने राजपाट और विलास-मोह त्यागकर गुरु गोरखनाथ की शरण ग्रहण की और वैराग्य मार्ग अपना लिया।

इसके बाद उन्होंने वैराग्य शतकम् की रचना की। उससे पहले वे शृंगार शतकम् और नीति शतकम् लिख चुके थे। उनकी ये तीनों कृतियाँ आज भी उपलब्ध हैं और संस्कृत साहित्य की अनुपम निधि मानी जाती हैं।



नीचे वैराग्य शतकम् से कुछ श्लोक अर्थ सहित साझा किए गए हैं, उनको पढ़ें व अपना अवलोकन साझा करें:

● क्या हम सच में जीवन में कुछ भोग पाते हैं?

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याता:
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।७।।

हमारे द्वारा विषयों का भोग नहीं हुआ, बल्कि हम ही विषयों के द्वारा भोगे गए; व्रत, उपासना आदि तप हमसे नहीं हुए, बल्कि हम ही त्रिविध तापों से तप्त हो गये; काल नहीं बीता, बल्कि हम ही बीत गए, विषयों की कामना बूढ़ी नहीं हुई, बल्कि हम ही बूढ़े हो गए।

अवलोकन:

● मनुष्य जीवन में सबसे आश्चर्य की बात क्या है?

निवृत्ता भोगेच्छा पुरुष-बहुमानोऽपि गलितः 
समानाः स्वर्याताः सपदि सुहृदो जीवित समाः । 
शनैर्यष्ट्युत्थानं घन-तिमिर-रुद्धे च नयने 
अहो मूढः कायस्तदपि मरणापाय-चकितः ।।९।।

जगत के विषयों को भोगने की इच्छा दूर हो चुकी है, पौरुष का अभिमान भी नष्ट हो चुका है; प्राणतुल्य समवयस्क मित्र हाल ही में स्वर्ग सिधार चुके हैं; अब धीरे-धीरे छड़ी के सहारे ही उठना हो पाता है; आँखें भी घने अन्धकार से रुद्ध हो रही हैं। अहा! फिर भी मेरा यह मूर्ख शरीर मृत्यु का विचार आते ही चौंक उठता है।

अवलोकन:

● जीवन की क्षुद्र चीज़ों का अनर्गल महिमामंडन कौन करता है?

स्तनौ मांसग्रन्थी कनक-कलशावित्युपमितौ 
मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशाङ्केन तुलितम् । 
स्त्रवन् मूत्रक्लिन्नं करिवर-कर-स्पर्धि जघनं 
मुहूर्त निन्द्यं रूपं कविजन-विशेषैर्गुरु कृतम् ।।१६।। 

स्तन मांस की ग्रन्थियाँ हैं, तथापि उनकी उपमा स्वर्ण के कलशों से दी गयी है; मुख कफ की खान है, तथापि उसकी तुलना चन्द्रमा से की गयी है; जाँघों से होकर मूत्र आदि बहता रहता है, तथापि उन्हें उस हाथी के सूड़ से स्पर्धा करनेवाला बताया गया है; प्रतिक्षण दोषपूर्ण निन्दनीय रूप को कुछ विशिष्ट कवियों द्वारा बड़ा महत्त्व प्रदान किया गया है।

अवलोकन:

● अज्ञान किसे कहते हैं?

अजानन् दाहात्म्यं पततु शलभस्ती दहने
समीनोऽप्यज्ञानाद् वडिशयुतमश्नातु पिशितम्। 
विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जाल-जटिलान् 
न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ।।१८।। 

अग्नि की दहन-शक्ति को न जानता हुआ पतिंगा प्रज्वलित अग्नि में जा पड़ता है, मछली भी अज्ञानवश लोहे के कटिये से युक्त मांस को निगल जाती है; परन्तु इस संसार में हम मनुष्य ही ऐसे हैं, जो कि जटिल अनर्थों के जाल-रूप विषय-भोगों को विनाश का कारण जानकर भी, उनका त्याग नहीं करते । अहो ! अज्ञान की महिमा कितनी गहन है!

तुङ्गं वेश्म सुताः सताम्-अभिमता: संख्यातिगाः सम्पदः
कल्याणी दयिता वयश्च नवमित्यज्ञानमूढो जनः । 
मत्वा विश्वम्-अनश्वरं निविशते संसार-कारागृहे 
संदृश्य क्षणभर तत्-अखिलं धन्यास्तु संन्यस्यति ।।२०।।

अज्ञान से विमूढ़ मानव यह मानकर इस संसार रूपी कारागार में निवास करता है कि मेरा मकान भव्य है, पुत्र सज्जनों द्वारा प्रशंसित हैं, सम्पदा असीम है, पत्नी सहायिका है, युवावस्था नयी है और जगत् चिरस्थायी है; परन्तु धन्य है वह व्यक्ति जो इन सबको क्षणभंगुर समझकर त्याग कर देता है।

अवलोकन श्लोक: 18 - 20:

● मनुष्य धन के लिए अपमान क्यों सहन करता है?

फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां 
पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम् ।
मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी 
सहन्ते संतापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ।।२७।।

जब खाने को प्रत्येक वन के वृक्षों पर सहज एवं स्वेच्छया प्राप्य फल विद्यमान हैं, जब पीने के लिए जगह-जगह पवित्र नदियों का शीतल तथा मधुर जल प्रवाहित हो रहा है, जब सोने को सर्वत्र सुन्दर लता पल्लवों की कोमल शय्या सुलभ है, तो भी कितने आश्चर्य की बात है कि लोभी मनुष्य धनिकों के द्वार पर उपस्थित होकर कितने ही तरह के अपमान तथा कष्ट सहन करते रहते हैं !

अवलोकन:

● जीवन में कुछ है जहाँ भय नहीं है?

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं 
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । 
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं 
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।।३१।।

विषयों के भोग में रोग का भय बना रहता है; उच्च कुल में आचार से भ्रष्ट होने का, धन-संचय में शासक द्वारा छीन लिए जाने का, अत्यधिक मान-सम्मान में अपमानित होने का, शौर्य-वीरता में शत्रु से हार जाने का, शारीरिक सौन्दर्य में बुढ़ापे का, शास्त्रों के पाण्डित्य में प्रतिवादी से पराजित होने का; विद्या-विनय-दान-धर्म आदि सद्गुणों में दुष्टों द्वारा निन्दा का और शरीर-धारण के विषय में यम अर्थात् मृत्यु से भय बना रहता है। इस प्रकार इस संसार में मनुष्यों के लिए सारी वस्तुएँ ही भय से परिपूर्ण हैं, एकमात्र वैराग्य ही अभय प्रदान करनेवाला है।

अवलोकन:


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अंत तक बने रहने के लिए धन्यवाद।

Monday, 15 December 2025

Non-Dualism or Nirvana or Zeroism - Some Video Resources

Hi, there's not much to write about the videos, just give them a watch and get some enlightenment.

















Videos are never enough to understand the full concept of Shunaya or Zeroism or Non-duality, so keep reading the basic texts for the same; they are all freely available in PDF. If you can comprehend them well, congratulations; if you can't, hurry up, you only live once, and never come back again.

Saturday, 13 December 2025

Maa Ka Doodh (माँ का दूध) Full Movie | Hindi | 4K





https://www.youtube.com/watch?v=XhTOLeevtQw

You'll love to visit this website: https://maakadoodh.in/break-the-chain/



https://youtu.be/EiukdpBo9sY?si=KGJsflPDrW_0lyg1


I know, truth is bitter and hits harder than we think, but it's always and forever good for health.

Reflect, review, reassess your choices, actions, and...

Thank me later!